हिंदी संस्करण

फ्रेश होकर बाथरूम से निकला ही था कि पत्नी पूछ बैठी- ‘आज देर तक सोते रहे। तबियत तो ठीक है न?’

‘हाँ, ठीक है। चाय पी ली क्या?’


‘नहीं, तुम्हारे इन्तजार में बैठी हूँ। दूध थोडा सा ही है सो सोचा कि अगर एक साथ चाय बनाएंगे तो इतने से ही अभी का काम चल जायेगा। क्या अब जाओगे दूध लेने।’


‘बहुत दूर की सोच ली। धन्यवाद!’

‘अच्छा चलो इसी बात पर आज तुम चाय बनाओ।’

‘उठते ही लगा दिया न लाईन में। चलो बना देते हैं। तुम भी क्या याद रखोगी।’ इतना कहते हुए शर्माजी घुसे रसोईघर में। दूध के ही भगोने में दो कप पानी डाला। तीन चम्मच चीनी और एक चम्मच चाय की पत्ती और चढ़ा दिया भगोने को गैस के ऊपर। चाय में उबाल आ ही रहा था कि मिसेज शर्मा आ गयी ‘दो कप चाय बनाने में इतना समय लगा दिया’ का उलाहना देते हुए।

गैस बुझाते हुए शर्माजी कहने लगे- ‘जरा धीरज रखें मैडम। स्पेशल चाय है, जरा रंग तो आने दीजियें।’

‘जरा उबाल आने देते तो रंग आ जाता।’

‘दूध कम है, रंग तेज होने पर चाय कडवी हो जाती।’

बातें करते हुए शर्माजी ने चाय कप में डाली और दोनों पीने बैठ गये।

‘चाय तो अच्छी बनी है पर तुमने पत्ती डालने में कँजूसी की।’

‘हाँ, वह तो है। ज्यादा दूध होता तो कंजूसी नही की होती। अच्छा यह बताओ, आज क्या बना रही हो?’

‘जो तुम कहो।’

‘दाल, रोटी और सब्जी ही ठीक रहेगी। वैसे भी बैठ-बैठे वजन बढ़ रहा है। लॉकडाउन खुलने के बाद डॉक्टर नेपाल के पास जाना पड़ेगा।’

‘लेकिन मैं नही जाऊँगी डॉ नेपाल के पास।’

‘क्यूँ।’

‘जब भी मैं घुसती हूँ, कहने लगता है- मैडम जरा वजन घटाइये। नही तो कई समस्याएँ झेलनी पडेंगी। जाइए पहले अपना वजन लेकर आइए बगलवाले कमरे से।’ एक बार उसके कहने से पहले वजन लेकर पहुँची तो कहने लगा- किसने कहा आपको वजन लेकर आने को? इतनी जल्दी किस बात की है? वजन कम करने पर ध्यान दिया कीजिये। लगता है वह मेरे इलाज पर कम, मेरे वजन पर अधिक ध्यान देता है।’

‘तुम्हारे मायके के गाँव का है न। फिर इतनी सुंदर जो लगती हो। लेकिन तुम्हें खुश होना चाहिये, वह तुम्हारा इतना ध्यान रखता है। नही तो कई डॉक्टर कुर्सी पर बैठते ही ब्लड प्रेशर जाँचकर कुछ लिख देते हैं और तीन महीने के बाद आने को कह देते हैं। उसकी बातों पर बुरा मत मानो। डॉक्टर नेपाल आदमी बढ़िया है। मुझे तो अच्छा लगता है।’                      

 

दोनों इस तरह बातें करते हुए चाय पी रहे थे कि फोन की घंटी बज उठी। ‘लो उठाओ फोन। तुम्हारा ही दोस्त होगा।’


‘नही, तुम उठाओ। मेरा हो तो कह देना मैं ट्वायलेट में हूँ।’

फोन का चोंगा उठाते हुए पत्नी ने कहा- ‘हैलो।’ 


‘नमस्कार भाभीजी, मैं वर्मा। कैसी है आप? शर्मा का क्या हाल है? कहाँ है और क्या कर रहा है? फोन वोन तो करता नही।’

‘वह तो अभी-अभी ट्वायलेट गये हैं। कोई खाश बात हो तो बता दीजिये, मैं कह दूँगी।’

‘खाश बात तो नही है। बहुत दिन हुए बातचीत नही हुई थी। सोचा कुशलक्षेम पूछ लूँ। आजकल मिलना तो हो नही पा रहा है।’

‘वो तो है भाई साहब। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। कितना खयाल रखते हैं आप हम लोगों का। अच्छा भाई साहब, गैस पर दूध चढ़ा रखा है, कहीं उबल न जाय। माफ करियेगा। फोन रख रही हूँ।’

‘सॉरी भाभीजी, आपको डिस्टर्व हुआ।’

‘कोई बात नही भाई साहब। फोन की घंटी बजने पर उठाना तो पड़ता ही है न। वो तो ट्वायलेट में हैं। अच्छा तो फोन करते रहियेगा।’

फोन रखते ही बुडबुड़ाने लगी- काम धाम तो कुछ है नही। सरकारी फोन है। अपना पैसा तो लगता नही। घुमाते रहो फोन और औरों को डिस्टर्व करते रहों।

शर्माजी से रहा नही गया तो बोल पड़े- ‘अब चुप भी हो जाओ। दूध का बहाना तो बना दिया, पर दूध है कहाँ? ख्वामख्वाह ब्लडप्रेशर बढ़ा रही हो। मैं चला नहाने। तुम भी जाओ रसोई का काम देखो।’

खाने के बाद क्या लेटे थे, शर्माजी को नींद आ गयी। फोन की घंटी फिर बज उठी। जब काफी देर तक बजती रही तो उठे शर्माजी। ‘हैलो’ कहते ही उधर से आवाज आई- ‘क्या यार, जब भी करो, तुम ट्वायलेट में होते हो। कुर्सी वहीं लगा रखी है क्या?’

‘कैसी बातें कर रहे हो वर्मा? तुम्हे तो पता है- मैं सुगर का पेशेंट हूँ, प्रोस्टेट से भी पीडि़त हूँ तो ट्वायलेट जाते रहना पड़ता है। फिर इन दिनों इम्युनिटी बढ़ाने के चक्कर में छोला, रजमाँ, चिकन आदि कुछ ज्यादा ही होने लगा तो कब्जियत भी होने लगी है। इसलिए ट्वायलेट जाते रहना पड़ता है। अच्छा बोल, क्या बात है?’

‘हालात ठीक नही है तो सोचा यार लोगों की खोज-खबर ली जाय। इसी चक्कर में तुझे भी फोन किया तो पता चला कि तुम ट्वायलेट पे ट्वायलेट जा रहे हो। तो फिकर हो गयी।’

‘धन्यवाद। पर इसमें फिकर करने की क्या बात हो गयी?’

‘सोचा, डिसेन्ट्री या डायरिया हो गया मेरे यार को तो कैसे जायगा अस्पताल? आजकल तो टैक्सी भी नही चल रही है। चलो जानकर अच्छा लगा। सब खैरियत है। अच्छा यह बता, तु आजकल क्या-क्या कर रहा है?’

‘करने को क्या रहा यार? बस पड़े हैं। कितना टी. वी. देखें, कितना पेपर पढ़ें। जिधर नजर डालो, कान लगाओ, कोरोना का ही कोरोना की बातें। विज्ञापन तक इसी बात पर केंद्रित है। मुझे तो टेलिफोन भी करने का दिल नही करता है। स्ट्रेस महसूस होने लगा है।’

‘लेकिन लोगों को जागरूक बनाने के लिये यह सब आवश्यक है यार, यह क्यों नही समझता। फिर भी कुछ तो करता ही होगा। लिखने-पढ़ने वाला आदमी है।’

‘लिखने का तो नही, हाँ पढ़ने का काम हो रहा है। ढेर सी किताबें पड़ी थी। पढ़ नही पाया था, सो पढ़े जा रहा हूँ।’

‘कितनी पढ़ ली?’

‘यही 6-7।’

‘और तू क्या कर रहा है?’

‘मैं?.. यार मुझे प्रेशर हो रहा है। अभी रखता हूँ। बाद में फिर बताऊँगा।’

दोनों ने फोन रख दिये। पर शर्माजी सोचने लगे हम इसे झाँसा देते रहे अब कहीँ यह भी तो हमें झाँसा नही दे गया?

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