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पेरेंटिंग-कॉउंसलिंग क्यों?

person access_timeMay 09, 2020 chat_bubble_outline0

BOISLOCKER ROOM का मुद्दा काफी गम्भीर और अहम है इसे लोग मज़ाक बनाने और मजे लेने में इस्तेमाल कर रहे हैं लेकिन यह किसी भी प्रकार से मजाक का हिस्सा नहीं है।
कुछ लोगों से बात हुई, उनमें से कुछ का कहना है कि बात तो हर कोई करता है कोई छुप के, तो कोई कई लोगों के बीच लेकिन करता तो हर कोई ही है। बात भी ठीक है लेकिन क्या बात करने का इस प्रकार का तरीका सही है? बात खुल के होनी चाहिए लेकिन गैंग रेप की प्लानिंग करना और भद्देपन पर उतरना कहाँ तक सही है?


उन्हीं कुछ लोगों में से कुछ लोग ऐसे थे जो जेंडर समर्थकों के रूप में नज़र आये। लड़कों के हिसाब से कुछ इस तरह की बातें सुनने को मिलीं
"क्या हुआ बात ही तो कर रहे थे न कोई सच-मुच में तो रेप नहीं कर दे रहे थे।”


इसका मतलब क्या है कि होने का इंतज़ार किया जाए और जब हो जाए तब एक्शन लिया जाए?

शायद लोगों को अब बचाव से बेहतर इलाज़ लगने लगा है, तभी वे इस तरह की बातों को कहने की हिम्मत रख रहे हैं।


जब इनसे ये पूछा कि इस तरह की बात करना तो रेप करने की प्लानिंग करना ही है, और आगे चल कर इनमें लोग रेपिस्ट भी बन सकते हैं।
इस पर जवाब क्या मिला वो भी देखिए
"अरे वो सब पैसे वाले हैं, आजकल लड़कियाँ पैसों के पीछे भागती है। पैसा फेंकों आगे-पीछे लड़कियों की लाइन लग जायेगी। और रेप तो गरीब लोग करते हैं देखिए कहीं कैब ड्राइवर तो कहीं बस ड्राइवर तो कहीं रिक्शाचालक।”


इस तरह की बातें बोलनेवालों की संख्या कुछ ज्यादा ही थी, अगर इनकी माने तो लड़कियाँ पैसों के लिए कुछ भी कर सकती हैं, और वो इन लड़कों के लिए सिर्फ उनके शारिरिक तनाव से मुक्ति और उनके मनोरंजन का साधन मात्र हैं। इस प्रकार की सोच से हमारे समाज को ताज़्ज़ुब तो बिल्कुल भी नहीं होगा क्योंकि हम उस समाज का हिस्सा हैं जहाँ लड़की को उसके पैदा होने से ही तहज़ीब में रहना सीखाया जाता है, उसे बचपन से ही समय-समय पर अहसास दिलाया जाता है कि उसे दूसरे के घर जाना है और वहाँ जाने के बाद मां-बाप की नाक नहीं कटनी चाहिये, मतलब वही परिवार की मान-मर्यादा का टोकरा लड़की के सिर पर रख दिया जाता है वो भी सिर्फ़ एक परिवार नहीं शादी के बाद ससुराल की भी इज्जत का ख्याल उसे ही रखना है।

 

अगर लड़की के साथ किसी भी तरह से कुछ गलत होता है तो पहले तो वो खुद ही नही समझ पाती कि उसे कैसे घर मे बताए और बताया भी तो घर वाले ही मामले को इज़्ज़त का हवाला देकर अक्सर दबा देते हैं।


वहीं दूसरी तरफ हम लड़कों को ये सब नहीं सीखते कि उसके कंधों पर परिवार की मान-मर्यादा है, अगर उसने किसी लड़की के साथ गलत किया तो भी लोग कहते हैं कि अरे क्या हुआ लड़का है गलती हो जाती है। उसे दूसरे ही तरह की सीख मिलती है उसका रोना अच्छा नहीं अगर रो दे तो भाई उसे लड़की है कह कर चुप करा दिया जाता है जैसे उसका रोना गलत है, उसे अपनी समस्याओं का समाधान ख़ुद ढूंढना है। ऐसा करके परिवार और समाज उसे भावनाओं को दबाना सिखाता है और कुछ समय के बाद वो लड़का खुद को मर्द को दर्द नहीं होता है वाले सांचे में फिट कर लेता है।

 

जबकि ये कहीं से भी सही नहीं है, हम सभी इंसान हैं और हम सभी को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का अधिकार है। हमारा समाज और परिवार मिलकर लड़के और लड़कियों के बीच में एक दीवार बना देते हैं और दोनों ही अपनी-अपनी लक्ष्मण रेखा के भीतर जीने लगते हैं लेकिन ये लक्ष्मण रेखा को कभी न कभी कोई न कोई पार तो करेगा ही।


इस तरह की सोच वालों को ये भी बताना पड़ा कि कई बड़े लोगों, यहाँ तक कि देश के कई नेताओं के ऊपर भी रेप का केस चल रहा है, उनके पास तो पैसे तब भी थे।

ख़ैर अगली लाइन देखिए-
"एक लड़की के साथ किसी ने नशे में 2 साल पहले बत्तमीज़ी की तो वो आज क्यों बोल रही है जब हुआ था तब बोलती।"

अब इनको कैसे समझाया जाय कि आप तो 21वीं सदी में आ गये हो लेकिन आपका समाज आज भी पुरानी सदी का है जहाँ ऐसा कुछ होने पर अपने घरवालों को बताना ही कितना मुश्किल होता है किसी भी लड़की के लिए। और जब तक घर वाले नहीं साथ देंगे किसी भी तरह से पुलिस में शिकायत नहीं की जा सकती है, और घरवाले मान भी जाते हैं तब भी पुलिस के पास शिकायत दर्ज करवाना किसी पहाड़ को काटने से कम नहीं होता है। पहले उनके दर्जनों सवालों का जवाब दो फिर कहीं जा कर वो शिकायत दर्ज होगी और अगर इल्ज़ाम किसी शशक्त इंसान पर हो तब तो और भी मुश्किल हो जाता है।

 

बहुत सारे मामलों में तो ऐसा भी देखा गया है कि पीड़ित के साथ पुलिस कर्मियों का ऐसा बर्ताव होता है कि वो खुद ही शिकायत वापस ले लें और अगर ऐसा नहीं होता तो पुलिसकर्मी ही आना-कानी करते हैं। अब ऐसे में कोई भी पीड़ित कैसे अपनी बात रखे, पहले खुद से लड़ाई, फिर परिवार से, फिर पुलिस से, फिर न्याय की इतनी जटिल प्रक्रिया से।
ऐसा नहीं है कि हर बार गलती लड़के की ही होती है और लड़की निर्दोष होती है, कई मामले ऐसे भी देखने को मिल जाते हैं जहाँ लड़कियाँ अपने अधिकारों का गलत फ़ायदा भी उठाते हुए नज़र आई हैं, और कई मामलों में लोगों का ऐसा मानना है कि ये सब नाम कमाने के इरादे से किया जाता है।


बात-चीत में जब कुछ लड़कियों से पूछा इसके बारे में वो क्या सोचती हैं तो यहाँ भी कुछ लड़कियों का जवाब वैसा ही था जैसे लड़कों का था, लेकिन कुछ लड़कियों ने इसे गलत भी बताया।

बात सही भी है बात तो सभी करते हैं, सभी को हटा कर अगर ये कहा जाए कि आज ज्यादातर लोग ऐसे ही बात करते हैं। एक ओर जहां सालों के संघर्ष के बाद लड़कियों को खुद को आगे बढ़ने का मौका मिल रहा है वहीं दूसरी ओर आगे बढ़ने और आधुनिकता के नाम पर युवा मस्तिष्क को भद्देपन की तरफ खींचा जा रहा है, और ऐसा करने के लिए इंटरनेट पर हज़ारों सोर्स मौज़ूद हैं। चाहे वो लड़की हो या लड़का उसे मानसिक रूप से विकृति की ओर लेकर जा रहा है।


लेकिन एक अहम मुद्दा ये है कि युवा वर्ग इस तरफ इतना आकर्षित क्यों हो रहा है?
इसके जवाब में ये पाया गया कि हम सभी किशोरावस्था से लेकर युवा होने तक शरीर में कई बदलावों का सामना करते हैं, और इन बदलावों के बारे में क्योंकि हमें कोई भी प्री-कॉउंसलिंग नहीं मिलती और ना ही हमें परिवार या विद्यालय की तरफ से इस तरह के मुद्दों पर कुछ भी सहायता मिलती है, तो हम खुद ही खुद को डिस्कवर करते हैं और आज के टेक्नोलॉजी के दौर में कोई भी चीज़ जानने के लिए या किसी भी समस्या के समाधान के लिए हम तुरन्त इंटरनेट का सहारा लेते हैं। क्योंकि किशोरावस्था में खुद को जानने का कौतूहल तो होता ही है तो हम लगातार इंटरनेट पर सब तलाशते हैं। लेकिन क्या इतना काफी होता है? क्या ये स्वस्थ परवरिश है?

समाज में मौज़ूद टैबू हमें हमारे ही बारे में ही खुल के बात करने से रोकता है, बच्चों को उनके शारीरिक ज्ञान से दूर रखना भी उनके लिए कितना खतरनाक हो सकता है ये बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन जब बात अपशब्दों के प्रयोग की आती है तब कोई टैबू नहीं होता है लोग खुल कर अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं, और बड़े गर्व के साथ ऐसा करते हैं।


बात खुल के होनी चाहिए, और चाहे फिर वो लड़का हो या लड़की बिना किसी भेद-भाव के इसके साथ बच्चों को यह भी सीखना चाहिए कि अपोज़िट जेंडर और उसकी प्राइवेसी का सम्मान कैसे करना चाहिए।


हमारे समाज में माता-पिता बनने के लिए किसी भी तरह की शिक्षा या प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं समझी जाती है, उनका ऐसा मानना है कि सब हो जाता है जैसे वो पले-बढ़े वैसे ही उनकी अगली पीढ़ी भी लेकिन ऐसा सोचना अपने ही बच्चों के साथ अन्याय करना है। युवाओं में आने वाली इस प्रकार की समस्याओं से निपटने के लिए माता-पिता को पेरेंटिंग-कॉउंसलिंग की जरूरत है। इसमें आपको वो सब बताया जाता है जिससे आप समझ पाते हैं कि आपको अपने बच्चे की किस प्रकार की मानसिक और शारीरिक तौर पर संभालना है और कब किस तरह से उसे बिना कोई मानसिक तकलीफ दिए हर छोटी-बड़ी चीज समझानी है।


हम में से ज्यादातर लोग पेरेंटिंग-कॉउंसलिंग सुन कर हँसते हैं लेकिन मामला गम्भीर है और इसे समझने के लिए अपने आस-पास नज़र दौड़ाइये आप समझ जाएंगे।

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