हिंदी संस्करण

कोरोना वायरस: खतरे की घंटी?

Corona Virus: A Possible apocalypse

person access_timeFeb 16, 2020 chat_bubble_outline0

बायोलॉजी की कक्षाओं में आप सभी ने मानव कोशिका और उसमें मौजूद घुमावदार सीढ़ी सदृश 'डीएनए' को अवश्य देखा ही होगा। वायरस और कुछ नहीं, एक प्रोटीन के लिफाफे में कैद 'डीएनए' अथवा 'आरएनए' के छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं, मानों किसी लिफाफे में तैरता हुआ कोई गूढ़ जटिल एवं कूटसन्देश !


चूंकि वायरस जीवित होने की वैज्ञानिक परिभाषा के एक महत्वपूर्ण मानक "प्रजनन" में अक्षम होते हैं इसलिए ज्यादातर वैज्ञानिक इन्हें "जीवन" का तमगा देने के प्रति संशकित हैं। चलिए, जीवन न ही सही, पर एक प्रकार की "इच्छा" का प्राकट्य तो वायरस करते ही हैं।


वायरस दूसरे जीवों की कोशिकाओं पर हमला कर कोशिका में घुसते हैं। यह इतना आसान नहीं। इसमें मायने यह रखता है कि वायरस की खुद की संरचना और उसकी शिकार कोशिका की संरचना क्या है। आप इसे यूं समझिए कि वायरस की शारीरिक संरचना एक चाबी के समान है, और कोशिका की संरचना एक ताले के समान। दोनों एक-दूसरे के लिए फिट हों तो ही 'कॉम्बिनेशन' बनेगा, अथवा नहीं।

अगर एक बार वायरस की 'एंट्री' कोशिका के भीतर हो गयी तो उसके बाद वायरस कोशिका की आंतरिक मशीनरी पर कब्जा कर धड़ाधड़ अपनी संताने उत्पन्न करने लगता  है  इस प्रक्रिया को प्रगुणन (replication) कहा जाता है । और पर्याप्त संख्या हो जाने पर उसकी सभी संताने कोशिका को फाड़ बाहर निकल जाती हैं ताकि शरीर में मौजूद दूसरी कोशिकाओं की हत्या के अपने मंसूबों को पूरा कर सकें।

 जानकारी के लिए बताता चलूँ   कि अनुमानित तौर पर पृथ्वी पर 10^31 वायरस हैं। जी हाँ, 10 के आगे 31 बार शून्य। यानी ब्रह्मांड में सितारों की संख्या से भी लाखों गुना वायरस पृथ्वी पर मौजूद हैं। किसी भी दूसरे जीव की तरह 'बैक्टीरिया' तथा वायरस जैसे सूक्ष्म जीवी भी अपने 'डीएनए' में बदलाव ला कर नए-नए खतरों और चुनौतियों का सामना करने के लिए खुद में बदलाव लाते हैं।

 

फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि मनुष्यों को पैदा होने के बाद 'डीएनए' में विविधता लाने के लिए 'जीन्स' का आदान-प्रदान के लिए जरूरी सेक्स में बेहद लंबा समय चाहिए होता है, वहीं इन सूक्ष्मजीवियों का 'टिपिकल' प्रजनन काल महज कुछ मिनटों का होता है। इसलिए ये सूक्ष्मजीवी हमारी दवाइयों के प्रति द्रुत वेग से प्रतिरोधकता विकसित करते रहते हैं। यही कारण है कि कोई भी दवाई इन रोगाणुओं पर लंबे समय तक कारगर नहीं रह पाती। सच कहूं तो इस भयंकर जैव-विविधता और बेहद सूक्ष्म आकार के कारण अभी तक वायरस का कोई इलाज संभव ही नहीं हो पाया है।



एक सच्चाई  तो यह भी है कि हमारी खानपान की आदतों का दोष भी हमें नष्ट करने में अहम भूमिका निभा रहा है। आज विश्व की एक बड़ी आबादी मांस पर निर्भर है। चूंकि मांस विक्रेताओं को मांस परोसना भी है और एक चिकन बर्गर का मूल्य 100 रुपये से कम भी रखना है, इसलिए जानवरों को कसाईखानों में अमानवीय परिस्थितियों में ठूंस कर रखा जाता है। जानवर रोगमुक्त रहें, इसलिए उन्हें थोक के भाव एन्टी-बायोटिक दवाईयां खिलाई जाती हैं।

 

इस तरह उन जानवरों में रहने वाले 'बैक्टीरिया' दवाइयों के प्रति प्रतिरोधकता विकसित करते रहते हैं। अब जब नयी दवाईयों का अविष्कार हो नहीं रहा और पुरानी दवाईयों का धड़ल्ले से इस्तेमाल करके हम इन नन्हे शैतानों को प्रतिरोधक बना चुके हैं तो इससे ज्यादा आत्मघाती और क्या हो सकता है ? यह कुछ ऐसा है कि हम अपने तरकश के सभी तीर चला कर निरीह भाव से अपनी अनिवार्य मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे है !
वैज्ञानिक चिंतित हैं कि अगर यही 'ट्रेंड' चलता रहा तो एक न एक दिन एक ऐसे "सुपरबग" का जन्म होगा जो द्रुत वेग से फैलता हुआ समूची मानवता को पूर्णतया नष्ट कर देगा और आज के समय में जब सम्पूर्ण विश्व में अनेक यात्री प्रतिदिन विश्व के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाते हों तो इस ''सुपरबग'' को समूची पृथ्वी पर फैलने में भला कितना समय लगेगा?

सच कहूं तो यह युद्ध आदिकाल से चलता आ रहा है और इन नन्हे मृत्यु-दूतों का १००%   इलाज कभी नहीं खोजा जा सका है । इन मृत्यु दूतों से घिरे रहना हमारी नियति है। करोड़ों जानें जाती रही हैं तो कुछ मनुष्यों के 'डीएनए' इन सूक्ष्मजीवियों से लड़ने में सफल होकर अपनी वंश परंपरा आगे बढ़ाते रहे हैं।


सृष्टि की शुरुआत से ऐसा हो रहा है। चीन के वुहान वायरस का भी यही अंजाम होगा। काफी लोग मरेंगे, पर अंततः मानव शरीर स्वयं इन वायरसों से लड़ने का तरीका ढूंढ लेगा।



जो खुद को परिस्थितियों के सापेक्ष ढाल लेंगे, वही जीवन के संग्राम में विजयी कहलायेंगे।

कमेन्ट

Loading comments...