हिंदी संस्करण

बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर

person access_timeMay 07, 2020 chat_bubble_outline0

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरुर्साक्षात परंब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः


ये हिन्दू दर्शन, धर्म-संस्कृति अपने आप में अपूर्व है जो ऐसे उदाहरणों और नमूने किरदारों से भरी है जो अनंत काल से आज तक, जहाँ समय, समाज और व्यक्ति में कितने ही परिवर्तन आये, पर वह अभी भी अक्षुष्ण है।  वो एक कहावत है न- ''लौट के बुद्धू घर को आये'' के नियमानुसार मजे की बात तो ये है कि संसार भर के वे लोग भी जो जीवन के यौवन काल में कदाचित ये नहीं मानते कि जीवन कि हर भौतिक उन्नति, प्रगति, विकाश की एक पराकाष्ठा है,  एक चरम बिंदु है जहाँ से ये ऊपर नहीं जा सकती अथवा यूं कहें कि इसे फिर नीचे की ओर आना पड़ता है। परन्तु वे दम्भी भी एक विन्दु के बाद ये मानने को तैयार होते ही हैं कि मात्र एक ही मार्ग है एक ही दिशा है जिसकी यात्रा अनंत से अनंत तक की यात्रा है जहाँ कोई समापन बिंदु नहीं, जहाँ विकास की पराकष्ठा नहीं ये मार्ग है धर्म का, शांति का, आत्मोत्थान का।
 

हमारे कितने ही मनीषियों ने इसी यात्रा में जीवन को निःसर्ग करके जीवन को अनंत कर दिया ऐसे ही मनीषी थे गौतम बुद्ध।
 

भले ही भारतीय वांग्मय बुद्ध को नास्तिक और उनके दर्शन को नास्तिक दर्शन के नाम से इंगित किया गया हो परन्तु फिर भी द्वारा समाज कल्याण के लिए दिखाए गए मार्ग अभी भी संसार का मार्गदर्शन कर रहे हैं। होने को तो बुद्ध ने कभी नहीं कहा कि मैं गुरु हूँ उन्होंने हमेशा ही कहा कि वे मानव संस्कृति की दहलीज पर खड़े मानव मात्र के मित्र है, वे ऐसे चिकित्सक हैं जो और कुछ नहीं बस स्वयं का अवलोकन करने का मार्ग दिखते हैं, सलाह देते हैं।

 

बुद्ध पूर्णिमा, आज 2564 वी बुद्ध जयंती


आज वैशाख महीने की पूर्णिमा है। जिसे बुद्ध पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है। इसी दिन 563 ईसा पूर्व गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी राज्य में हुआ था।
आज होनेवाली पूर्णिमा को वैशाख पूर्णिमा तथा बुद्ध पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।  563 ईसा पूर्व भगवान बुद्ध का जन्म इसी वैशाख महीने की पूर्णिमा को हुआ था। इसी बैशाख पूर्णिमा को सिद्धर्थ ने छह साल की कठोर साधना के बाद गया में बुद्धत्व प्राप्त किया था और फिर इसी बैशाख पूर्णिमा को बुद्ध ने 483 ई.पू देवरिया जिले के कुशीनगर में निर्वाण प्राप्त किया था। भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण, ये तीनों एक ही दिन यानि वैशाख पूर्णिमा को हुए थे। इसलिए बौद्ध धर्म में इस दिन का बहुत ही महत्व है।
बुद्ध ने जीवन के प्रेरक जिन अनेक नियमों की बड़ी सटीक और सुरुचिपूर्ण व्याख्या की उनमें से हम कुछ को इस प्रकार कह सकते हैं...।


शक करने की आदत बहुत खतरनाक होती है। शक लोगों को अलग कर देता है। ये आदत पति-पत्नी का रिश्ता, दो दोस्तों की दोस्ती और दो प्रेमियों का प्रेम खत्म कर सकती है। इससे बचना चाहिए।

हम किसी भी बात पर जैसे ही क्रोधित होते हैं, हम सच का मार्ग छोड़कर अपने लिए प्रयास करने लग जाते है। क्रोधित व्यक्ति स्वार्थी हो जाता है। सिर्फ अपनी बात मनवाने की कोशिश करता है। क्रोध से बचना चाहिए।

ईर्ष्या और नफरत की भावनाएं जीवन में कोई भी खुशी हासिल नहीं करने देती हैं। ये भावनाएं हमारे मन की शांति खत्म कर देती हैं।

अज्ञानी व्यक्ति बैल के समान होता है। वह ज्ञान में नहीं, सिर्फ आकार में बडा दिखता है।

क्रोध को पाले रखना, गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने के लिए पकड़े रहने के सामान है, इसमें हमारा हाथ भी जलता है।

इस संसार में कभी भी खुशी और सुख स्थाई नहीं हो सकते। ठीक इसी तरह दुख भी स्थाई नहीं है। अगर आप अंधेरे में डूबे हैं, बुरे समय का सामना कर रहे हैं तो आपको रोशनी की तलाश करनी चाहिए।

बीते हुए समय को याद नहीं करना चाहिए। भविष्य के लिए सपने नहीं देखना चाहिए, बल्कि अपने दिमाग को वर्तमान में ही केंद्रित करना चाहिए।

जीवनभर बिना ध्यान के साधना करने की अपेक्षा जीवन में एक दिन समझदारी से जीना कहीं अच्छा है।

आप अपने गुस्से के लिए दंडित नहीं होते हैं, आप अपने गुस्से से ही दंडित होते हैं।

हर इंसान अपने स्वास्थ्य या बीमारी का लेखक है। इसीलिए खान-पान और दिनचर्या का ध्यान रखना चाहिए।

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