हिंदी संस्करण

कुरुक्षेत्र का उत्तरदायी कौन?

person access_timeMay 06, 2020 chat_bubble_outline0

पूर्वीय सभ्यता और संस्कृति की बनावट ही ऐसी है कि यहाँ घर परिवार का अधिकतम भर स्त्रियों के कंधों पर ही होता है। पर यहाँ ऐसा भी नहीं है कि ये भार कोई जबरन उनके सिर मढ़ देता है बल्कि सदियों की परंपरा है और जिसे महिलाएं बड़े ही गौरव के साथ लेती भी हैं, प्रसन्न होती हैं इन जिम्मेदारियों को उठाकर फिर चाहे वह घर परिवार चलाने की बात हो, या घर परिवार में शांति और सकूं के लिए बनाये जाने वाले नियमों की ही बात क्यों न हो, बच्चों में संस्कारों की बात हो या उनके शादी विवाह हर जगह यहाँ के समाज में महिलाओं का वर्चस्व है।

अब इतना सब कुछ किये जाने पर कई बार जाने अनजाने कुछ ऐसा भी हो जाता है जो शायद सही न भी होता हो या फिर मात्र दृष्टिकोण भेद की भी बात हो सकती है तो फिर ऐसे में उनके सब किये कराये पर तत्काल ही पानी फिर जाता है और शुरू हो जाता है उलाहनों का, शिकायतों का और तो और व्यंग्यों का सिलसिला। दोषों का तुषारापात
जिन्हें प्रमाणीकरण देने को लोग रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों का सहारा लेना शुरू कर देते हैं।
 

कहते हैं सीता की वजह से लंका जल गई, अरे भइया ये देखो कि असुरों को भगवान के हाथों मुक्ति मिल गयी लेकिन तब भी सीता के दामन पर ही प्रजा ने दाग लगाया। गलती पुरुष की हो या स्त्री की, दाग तो स्त्री के माथे ही मढ़ा जाएगा यही हमारे समाज का नियम - कायदा है, चाहे त्रेता हो, द्वापर हो या फिर कलयुग।
जो लोग द्रौपदी को महाभारत युद्ध और कुरुवंश के नाश का कारण बताते हैं। वे लोग ये जान लें कि महाभारत का युद्ध पुरुषों के घमंड, क्रोध और उनके द्वारा कि गई गलतियों का परिणाम था और सबसे बड़ी गलती थी राज्य से ज्यादा राजसिंहासन पर आरूढ़ राजा को महत्व देना।

 आप कहेंगे कैसे तो आइए गिनाते हैं कुछ गलतियों को......


गलती संख्या 1: शांतनु की सत्यवती के प्रति आसक्ति।


गलती संख्या 2: गंगा पुत्र का अपने अनुज का प्रतिनिधित्व करते हुए काशी राजकुमारियों का हरण करना।


गलती संख्या 3: सिंहासन के उत्तराधिकारी के लिए परिवारवाद की परंपरा की स्थापना, जबकि महाराज भरत ने परिवारवाद से ऊपर उठ कर शान्तनु को अपना उत्तराधिकारी बनाया था, जो शांतनु के बाद फिर कभी नहीं हुआ।


गलती संख्या 4: शकुनी को आजीवन हस्तिनापुर में बसा लेना।


गलती संख्या 5: महाराज पांडु का अपने श्राप से भली-भाँति परिचित होते हुए भी माद्री पर मोहित होना।


गलती संख्या 6: धृतराष्ट्र का पुत्रमोह।


गलती संख्या 7: दुर्योधन का इंद्रप्रस्थ के प्रति लालच।


गलती संख्या 8:  युधिष्ठिर का द्यूत में अपने भाइयों और पत्नी को सम्पत्ति समझकर दाव पर लगाना।


गलती संख्या 9: भरी सभा में द्रौपदी का वस्त्र-हरण।


गलती संख्या 10: वस्त्र-हरण में सभी सभासदों का असहाय रह जाना।


गलती संख्या 11: महाराज धृतराष्ट्र का द्रौपदी वस्त्र-हरण में मौन रहना, जबकि वे पिता और राजा दोनों ही अधिकारों से इस कृत्य को रोक सकते थे।


गलती संख्या 12: शांति दूतों का अपमान करना और प्रस्ताव ठुकराना। वसुदेव कृष्ण ने शांति के लिए द्रौपदी को अपने अपमान का विष पीने के लिए भी मना लिया था लेकिन दुर्योधन को यह मंजूर न हुआ।

 

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