हिंदी संस्करण

‘ट्रिंग ट्रिंग’

person access_timeMay 04, 2020 chat_bubble_outline0

अभी चाय का पहला घूंट भी गले से नीचे नहीं उतरा था कि फोन की घंटी बज उठी। पत्नी कहने लगी- ‘सुबह हुई नही की घंटी बजनी शुरु। देखो तुम्हारा ही पत्रकार मित्र होगा, जो सुबह-सुबह फोन करता है।’


फोन उसके लिए भी हो सकता था। पर सुबह-सुबह ही कौन बहस करे? चाय का दूसरा घूंट लेकर उठा। ‘हैलो’ कहते ही उधर से आवाज आई- ‘जय श्रीराम।’


मैं भी शिवभक्त। पशुपतिनाथ के देश का रहनेवाला। बोल उठा- ‘जय शम्भो।’


‘क्या कर रहे हो पण्डत?’ उधर से आवाज आई।
 
मैने कहा- ‘कौन हैं भाई? जरा नाम तो बताने की कृपा करें।’


कहने लगा- ‘एक महीने से मुलाकात क्या नही हुई, आवाज भी पहचाननी छोड़ दी। कमाल के दोस्त हो यार? मैं हूँ शर्मा।’


‘ओहो शर्मा। कहो क्या हाल है? जुकाम हो रखा है क्या? आवाज बडी भारी है। बोल सुबह-सुबह कैसे याद किया?’


‘अभी अभी ड्यूटी पर पहुँचा हूँ। चाय पीते हुए तुम्हारी याद आ गयी। सोचा जरा हालचाल पूछ लूँ। तू तो फोन करने से रहा। सब खैरियत है न? क्या कर रहे थे?’


‘बस सुबह का पहला काम। चाय पी रहा था।’


‘अच्छा? काली या दूधवाली?’


‘दूधवाली तो अब लॉकडाउन खुलने के बाद ही नसीब होगी। अभी तो काली से ही काम चलाना पड़ रहा है।’

 

 ‘क्यों?’

 
‘लॉकडाउन है न। कौन जाये बाहर। दूध के चक्कर में कोरोना ने गला दबोच लिया तो लेने के देने पड़ जायेंगे।’

 

‘हाँ वह तो है। एहतियात बरतना ही बेहतर है। इस लॉकडाउन की वजह से हर तरफ टेंशन ही टेंशन है। अब 10 दिन और बढ़ गये हैं। फिर बढ़ाने की बातें सुन रहे हैं। हम तो ठहरे खबरनवीस। ड्यूटी पर तो पहुँचना ही पड़ता है। सो पहुँच गये। और बता क्या-क्या हो रहा है?’


‘क्या होगा? घर के अंदर पड़े हैं।’

 

‘तो समय कैसे बिताते हो?’


‘बीबी को खुश करने के लिए कभी रसोई का काम, तो कभी दरवाजे-खिड़कियों की धूल झाड़ने-पोंछने का काम करता रहता हूँ।’ मेरी यह बात बीबी को शायद पसंद नही आई। आँखें तरेरते हुए मुझे देखने लगीं।


उधर से आवाज आई- ‘अच्छा एक बात बता तो।’


‘क्या? बोल।’


‘ये जो राजनीति के लोग नजरबंद होते है, वे किस तरह समय बिताते होंगे?’


‘क्या पता यार। हाँ एक बार टी.वी. पर एक नेता को देखा था। उसने दाढ़ी बढ़ा ली थी। बिना लाल टोपी और कोट के भी सान्ता क्लॉज सा सुंदर दिख रहा था।’


‘बड़ा होशियार निकला यार। दाढ़ी बढ़ाकर साबुन और पानी की बचत के अलावा समय की भी बचत की और हमदर्दी भी बटोर ली। बाहर निकलना तो है नही, तो फिर चिकने क्यों दिखा जाय?’

‘सही कहा तुमने। होशियार होते हैं तभी तो कभी इस पार्टी में तो कभी उस पार्टी में। और इस तरह कभी उपमंत्री तो कभी राज्य मंत्री। इस तरह के होशियार लोग कैबिनेट मंत्री तक हो जाते हैं। पर यह तो बता, यह सब क्यो पूछ रहा है?’ उसकी बातों से उकताते हुए मैने पूछा।


‘अरे यार, लॉकडाउन की स्थिति के बारे में एक फिचर तैयार करनी है। सोचा तुम तो लेखक, निबंधकार, कवि और पता नही क्या-क्या हो, तो सोचा तुम्हारे पास तो बहुत से आइडिया होंगे, सो पूछ रहा हूँ।’


‘तो मिला क्या?..... अच्छा सुन, अब फोन रख। मुझे ट्वायलेट जाने की जल्दी हो रही हो।’ पत्नी चोंगा रखने के लिए इशारे पर इशारे किये जा रही थी। इसलिए उसके इशारे को शांत करने लिए कहा।


उसके फोन रखने पर पत्नी से पूछा- ‘क्या बात है?’


कहने लगी- ‘तुम भी कमाल के आदमी हो।’


‘तुम्हे आज पता चला? कमाल का न होता तो तुम मेरे हाथ कैसे आती? बोलो।’


‘अब छोड़ो इन बातों को। बच्चे सुन लेंगे। चाय ठंडी हो गयी होगी। गप्प में लग जाते हो तो कुछ भी ध्यान नही रहता।’


‘तो बना दो न दूसरी प्याली, गरमा गरम। दो-चार टुकड़े अदरख के भी डाल देना। गले में हलकी सी खराश है।’


‘ठीक है, बना देती हूँ। जब तक चाय बन जाय तब तक तुम इतना कर दो।’


इतना कहते हुए उसने झाड़ू पकड़ा दी। ‘और हाँ। जरा पोछा भी कर देना। चाय पर चाय पीते रहते हो। सुगर बढ़ गया तो मुसीबत।’


झाडु पकडी ही थी कि फोन की घंटी फिर बज उठी। मैने पत्नी से कहा- ‘देखो तो कौन है? मेरे लिए हो तो बोल देना मैं ट्वायलेट में हूँ। ऑफिस तो है नही कि कहलवा दूँ साहब मीटिंग में हैं।’

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