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कोरोना वैक्सीन

person access_timeApr 27, 2020 chat_bubble_outline0

कोरोना संक्रमण विरुद्ध बनाई गई वैक्सीन का मानव ट्रायल पूरा हो चुका है| इंग्लॅण्ड की ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी और जेनरल इंस्टिट्यूट के सहकार्य में बनी इस वैक्सीन की पहली डोज लेनेवाली महिला एलिसा ग्रानाटो साथ ही इस वैक्सीन के सफल होने पर भी विश्वस्त हैं|  

कोभिड- 19 नाम दी गई ये वैक्सीन ‘ऐडिनो वायरस’ और सार्स-सीओभी 2 के 'फ्युजन’ से तैयार किया गया एक नया वायरस ही है| इस नए वायरस की विशेषता क्या है कि ये बाहरी रूप मेंसार्स -सी ओ भी- 2 की तरह ही कठोर है परन्तु इसकी भीतरी बनावट सामान्य सर्दी जुखाम के वायरस (एडिनो वायरस) को भी कमजोर बनाकर की गई है|



वैक्सीन बनानेवाली टोली का नेतृत्व ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के ‘भ्याक्सिनोलोजी डिपार्टमेन्ट’ के प्रोफेसर सराह गिल्बर्ट ने अन्य सहयोगी अक्सफोर्ड युनिभर्सिटी के ’पेडियाट्रिक इन्फेक्सन एन्ड इम्युनिटी’ विभाग के प्रमुख अनुसन्धानकर्ता प्रोफेसर एन्ड्रु पोलार्ड अक्सफोर्ड युनिभर्सिटी के जेनर इन्स्टिच्युट के निर्देशक प्रोफेसर एड्रियन हिल, अक्सफोर्ड युनिभर्सिटी के जेनर इन्स्टिच्युट के एशोसिएट प्रोफेसर तथा अनुसन्धानकर्ता डाक्टर टेरेसा लाम्बे और अक्सफोर्ड युनिभर्सिटी के डुक वैक्सिन सेन्टर के प्रोफेसर कैथरिन ग्रीन के सहयोग में तीन महीने के अल्पकाल में की है।

साइन्स मिडिया सेन्टर ने वैक्सिन बनानेवाली टोली के साथ वैक्सिन के निर्माण, ‘ट्रायल’ और इसके व्यावसायिक उत्पादन को लेकर बृहद् बातचीत हुई।
इस बातचीत को मेडिकल शिक्षा सम्बन्धी वेबसाइट मेडस्केप डॉटकॉम ने प्रकाशित किया है। विगत डेढ़ महीने से मैं कोरोना विषयक विभिन्न लेख लिखकर इस विषय की जानकारी और सूचना प्रवाहित करने के काम में संलग्न रहता आ रहा हूँ| प्रत्येक दिन कैयों घंटे समय इन्टरनेट पर कोरोना सम्बन्धी विभिन्न समाचार, अनुसन्धान, विज्ञों के लेख आदि पढने में व्यतीत हो रहे हैं। ‘लॉक डाउन' के समय पठन-पाठन-लेखन के अलावा और किया भी क्या जा सकता है?


इससे पाठकों को वैक्सीन के सम्बन्ध में यथेष्ट जानकारी देने के साथ ही इस सम्बन्धी विभिन्न पक्षों की जानकारी भी मिल सकेगी। 

 

प्रश्न : लॉकडाउन ने क्लीनिकल ट्रायलों को किस तरह प्रभावित किया है?

 

उत्तर : अगर (जब) विषाणु का प्रसार नहीं होगा और नये मरीज़ नहीं होंगे, तब यह कह पाना बहुत मुश्किल हो जाएगा कि वैक्सीन संक्रमण को रोकने में काम कर भी रही है कि नहीं। अभी भी हालांकि कुछ विषाणु का कुछ प्रसार जारी है। इससे हम अपनी वैक्सीन की एफीकेसी को समझ सकते हैं कि वह कितना काम कर रही है। जितना कम समाज में विषाणु-प्रसार, उतना वैक्सीन की संक्रमण-रोकथाम को समझ पाने में देरी।

 

प्रश्न : लॉकडाउन के दौरान आप-लोग उन इलाक़ों को चिह्नित करके शोध करेंगे जहाँ अभी संक्रमण का कर्व उठ रहा है?

 

उत्तर : हम-लोग अभी कुछ सप्ताह से दुविधा में हैं। हमें उन लोगों को चिह्नित करना है, जिनके विषाणु से संक्रमित होने की आशंका अधिक है। जो लोग विषाणु से अधिक एक्पोज हो रहे हैं, उनमें स्वास्थ्यकर्मी प्रमुख हैं। अभी हमने कोई रणनीति नहीं बनायी है। हम दुनिया-भर के अपने अन्य साथियों के सम्पर्क में भी हैं, ताकि अन्य जगह भी शोध स्थापित किये जा सकें। अफ़्रीका इनमें प्रमुख है, क्योंकि वहाँ भविष्य में टीके की बहुत ज़रूरत पड़ने वाली है।

 

प्रश्न : क्या चैलेन्ज-ट्रायलों के बारे में आपने सोचा है?

 

उत्तर : यह वहाँ हो सकता है, जहाँ लोग टीका लगवाने के बाद स्वयं को जानबूझकर संक्रमित करने का प्रयास करें। पहले अन्य कोरोना विषाणुओं के मामलों में इस तरह के चैलेन्ज-ट्रायल किये जा चुके हैं, किन्तु वर्तमान कोरोना विषाणु के मामले में ऐसा अब-तक नहीं किया गया है। चैलेन्ज-ट्रायल के अपने जोखिम हैं। मान लीजिए कि आपने टीके की गलत डोज़ लगा दी और उससे व्यक्ति को रक्षण नहीं मिला। अब अगर इस व्यक्ति को संक्रमण का चैलेन्ज दिया जाएगा, तब उसे गम्भीर संक्रमण हो सकता है। ऐसे शोध अभी तो मुश्किल हैं, जब तक कोई ढंग के उपचार न मिल जाएँ ताकि ट्रायल में अगर समस्या हो, तो उसे देकर व्यक्ति को सुरक्षित रखा जा सके।

टीके के परीक्षण के लिए स्वयंसेवकों की सुरक्षा के रास्ते में अनेक रोड़े हैं। यद्यपि लोग सोच रहे हैं कि चैलेन्ज-ट्रायलों के बारे में सोच रहे हैं, ताकि टीकों को शीघ्र विकसित किया जा सके।

 

प्रश्न : आप-लोग सामान्य फेज़ 3 ट्रायल के साथ चैलेन्ज-ट्रायल क्यों नहीं कर रहे?

 

उत्तर : जैसा कि मैंने अभी-अभी बताया कि मनुष्यों को चैलेन्ज-मॉडल बनाना जोखिम-भरा है। जब इस विषाणु के खिलाफ़ दवा उपलब्ध हो जाएगी (और हाल के वैक्सीन-विकास में असफलता हाथ लगती है), तब चैलेन्ज-मॉडल पर काम करना बेहतर रहेगा।

 

प्रश्न : क्या आप उम्मीद करते हैं कि आपका टीका कुछ समूहों में अन्य से बेहतर काम करेगा?

 

उत्तर : जो लोग सत्तर की उम्र से ऊपर के हैं, उनमें टीके उतना अच्छा काम नहीं करते। हमें अपने ट्रायलों में इसका अन्वेषण करना है कि हमारा टीका बूढ़ों में कैसा काम करता है। अगर टीके के कारण मिलने वाली प्रतिरक्षा कमज़ोर है, तब हम टीके की अनेक डोज़ें देनी पड़ सकती हैं ताकि प्रतिरक्षा-तन्त्र को बेहतर ढंग से सशक्त किया जा सके।

 

फ़्लू के टीकों में हमें पाया है कि बूढ़ों में इनसे जन्मने वाली प्रतिरक्षक क्षमता कुछ कम (बहुत कम नहीं) होती है। हाँ, टीकों से जन्मने वाली प्रतिरक्षा युवाओं में बेहतर होती है, किन्तु वृद्धों में बहुत न्यून होती हो, ऐसा नहीं होता।

 

प्रश्न : कितना निवेश जोखिम में है अगर इस टीके की सितम्बर तक प्लान की गयीं एक मिलियन डोज़ें सफलतापूर्वक काम नहीं करतीं?

 

उत्तर : यह सच है कि आपने कितनी मात्रा में टीकों का उत्पादन का निर्णय लिया है, खर्चे की मात्रा तय करता है। आप अत्यधिक मात्रा में टीके बना रहे हैं, या केवल थोड़ी ही अधिक मात्रा में? अन्य वैज्ञानिक-समूह भी अच्छा काम कर रहे हैं, हमारा प्रोग्राम यद्यपि सबसे अधिक महत्त्वाकांक्षी है। यह बताता है कि हम अपने टीके को लेकर कितने आत्मविश्वास में हैं। हम सोचकर चल रहे हैं कि यह काम करेगा और ढेर सारी इन डोज़ों की ज़रूरत पड़ेगी।

अगर सफलता की उम्मीद कम होती, तब हम एक ही टीका-निर्माता के पास जाते। कम डोज़ें ही बनवाते। किन्तु हमें टीके से ख़ासी उम्मीद है। अन्य समूह भी एडिनो वायरस से टीके बनाकर काम कर रहे हैं, पर चिम्पैंज़ी-एडिनो वायरस से नहीं। यह बेहतर विषाणु है और इसे बनाना किफ़ायती भी है। एक मिलियन टीकों में निवेश किया गया धन कम है, अगर आपका उत्पादन पाँच गुना बेहतर है।

 

प्रश्न : कितना धन लगा है?

 

उत्तर : दसियों मिलियन पाउण्ड।

 

प्रश्न : क्या लोगों को टॉप-अप टीकाकरण की ज़रूरत पड़ने वाली है?

 

उत्तर : इसी तरह अन्य टीकों से हमें जो तजुर्बा मिला है, उसके अनुसार तो नहीं लगता कि ज़रूरत पड़ेगी। यह टीका लगवाने वाली जनसंख्या की उम्र पर भी निर्भर करेगा। बूढ़ों में टीके से मिलने वाली प्रतिरक्षा कम हो सकती है, युवाओं में यह प्रतिरक्षा बेहतर होगी। इबोला के खिलाफ़ टीका इसी तकनीकी से बनाया गया है और उससे मिलने वाली प्रतिरक्षा साल-भर के बाद भी मज़बूत रहती है।

 

प्रश्न : टीका यूके में बनेगा?

 

उत्तर : हाँ।

 

प्रश्न : अगर टीका यूके में बनेगा, यानी डोज़ें यूके में ही इस्तेमाल होंगी ?

 

उत्तर : यह इतना सरल नहीं है। हम चाहते हैं कि कोई एक देश सारे टीकों पर एकाधिकार न करे, क्योंकि इनकी ज़रूरत अन्तरराष्ट्रीय रूप से पड़ने वाली है। अभी इस मामले को सुलझाना है। इसका सम्बन्ध इससे भी है कि टीके के उस ख़ास बैच के विकास को किसने फण्ड किया? हम चाहते हैं कि टीका वहाँ पहुँचे, जहाँ इसकी सर्वाधिक ज़रूरत हो। आज यह स्थिति यूरोप व अमेरिका में है, किन्तु आगे यह बदल सकती है। चीन की तरह यहाँ आगे रोगी घट सकते हैं। अफ़्रीका के गरीब देशों में आगे ज़रूरत पड़ सकती है, हम चाहते हैं कि वहाँ यह टीका ज़रूर पहुँचे।

 

प्रश्न : यह कैसे तय हो कि संसार में सभी को एक ही समय में टीका मिलने की उम्मीद बराबर हो?

 

उत्तर : इस पर वार्ताएँ चल रही हैं। कोअलिशन ऑफ़ एपिडेमिक प्रिपेरेडनेस इनोवेशंस इस विषय में काम कर रहा है। यह सुनिश्चित कराया जा रहा है कि टीका सबसे ज़रूरतमन्द को सबसे पहले मिले। सात बिलियन टीके तुरन्त तो बन नहीं सकते, कुछ तो प्राथमिकता रखनी ही पड़ेगी।

 

प्रश्न : टीका लगाने के बाद आप-लोग कुछ महीनों तक ख़ून में किन एंटीबॉडी की जाँच करेंगे?

 

उत्तर : अभी वह टेस्ट हमारे पास नहीं है, किन्तु उसपर हम काम कर रहे हैं। शीघ्र ही यह जाँच हमारे हाथ में होगी। इबोला के लिए हम यह कर चुके हैं, हमें इस बार भी कर सकने का विश्वास है। हमारे बढ़िया सहयोगी हमारी इस काम में मदद कर रहे हैं।

टीका लगाने के उपरान्त हम एंटीबॉडियों का ही परीक्षण नहीं करेंगे, कोशिकीय प्रतिरक्षा का भी अध्ययन करेंगे। कोशिकीय प्रतिरक्षा भी कोरोना वायरसों के लड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, ऐसा हमें लगता है। इसीलिए हमने ऐसी टीके की ऐसी तकनीकी चुनी है, जो कोशिकीय प्रतिरक्षा विकसित करे और एंटीबॉडी निर्माण भी।

 

प्रश्न : क्रिसमस तक कितने टीके तैयार हो जाएँगे?

 

उत्तर : सब अच्छा रहा, तो सैकड़ों मिलियन। पर अभी कुछ भी निश्चित तौर पर कहना जल्दबाज़ी होगी। कोई वादा नहीं।

 

प्रश्न : विषाणु में अगर आगे म्यूटेशन हुए, तब भी टीका काम कर लेगा?

 

उत्तर : टीके के कारण जो एंटीबॉडी बन रही हैं, वे म्यूटेशन के बाद भी काम करेंगी। ऐसा लगता है। कोरोना विषाणुओं की विविधता फ़्लू-विषाणुओं की विविधता के आगे कुछ भी नहीं हैं, पर उनके खिलाफ़ भी टीके काम करते ही हैं।

 

प्रश्न : आप 80 प्रतिशत निश्चिन्त हैं, बांक़ी के 20 प्रतिशत के बारे में?

 

उत्तर : हमेशा एक अनिश्चितता तो रहती ही है। हम कभी पूरी तरह निश्चित रूप से नहीं कह सकते। इस तकनीकी पर हमें पहले भी काम किया है, इसलिए विश्वास है। सफलता की उम्मीद बहुत अधिक है।

 

प्रश्न : लेकिन उत्पादन में जोखिम तो है ही।

 

उत्तर : हाँ, अगर टीके ने काम नहीं किया और मिलियन डोज़ें बनी रखी हैं, तब धन बर्बाद हुआ जानिए।

 

प्रश्न : क्या टीके के बाद इम्यून-एनहैंसमेंट के कारण अगले संक्रमण की स्थिति और बुरी हो सकती है?

 

उत्तर : इसी के लिए पहले जानवरों पर शोध किये जाते हैं। अनेक टीकों पर किये गये हैं। लगता तो नहीं है कि ऐसा होगा। पर फिर भी निगरानी तो रखनी ही होगी टीका लगवाने वालों पर। उन्हें पहले से बताना भी होगा। उसके बाद ही ट्रायल सम्भव हैं।

 

प्रश्न : जनता के लिए टीका कब तक आ जाएगा?

 

उत्तर : ट्रायल में सफलता के बाद नियन्त्रकों से चर्चा होगी संस्तुति के लिए। लगभग छह सप्ताह में उम्मीद है।

 

प्रश्न : जनसंख्या के कितने प्रतिशत को टीका लगवाना पडेगा ताकि हर्ड-इम्यूनिटी मिल जाए और विषाणु का प्रसार रुक जाए?

 

उत्तर : हम इस विषाणु के सम्बन्ध में इसका उत्तर नहीं जानते ; ऐसा लगता है काफ़ी बड़े प्रतिशत में लोगों को वैक्सीन लगानी पड़ेगी।-

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