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एक छोटी सी मुलाकात (हास्यव्यंग्य)

person access_timeApr 25, 2020 chat_bubble_outline0

‘क्यों बड़बड़ा रहे हो? सपना देख रहे हो क्या?’ पत्नी ने सोए हुए पति को झकझोरते हुए पूछा।

‘क्या बात है’ पति आँखें मलते हुए उठ बैठा।

‘रात भर बड़बड़ाते रहे। किस पर गुस्सा उतार रहे थे और किसे कह रहे थे नामाकूल?’

‘अच्छा? क्या इतनी जोर से बड़बड़ा रहा था? क्या तुम ठीक से सो नही पायी?’

सोसल डिस्टेंशिंग के नियमों का पालन करते हुए अलग-अलग पलंग पर सोने के बावजूद भी मेरी बड़बड़ाहट के कारण उसकी निद्रा में खलल पहुँचने से मैं परेशान हो उठा। और अपने को सँभालते हुए कहने लगा- ‘चलो चाय पीते हैं।’


‘पहले हाथ-मुँह तो धो लो। पर यह भी तो बता जाओ- क्या बात थी?’

‘अरे क्या होता? वही कोरोना का रोना। सुबह-शाम, रेडियो-टेलिविजन और अखबारों को पढ़ते, देखते, सुनते और टेलिफोन पर बातें करते हुए दिमाग पर इस जाहिल का इतना असर हो गया है कि सोने पर सपने में भी अब यही आने लगा।’


‘अच्छा? जरा यह भी तो बता दो कैसा लगता है?’ पत्नी ने हँसते हुए कौतूहलता जाहिर की।

‘चेहरा तो उसका चादर से ढका था। पर था मोटा-तगड़ा और गठिला। समझो गोलमटोल।’

‘तभी तो अपने को फन्नेखाँ समझनेवाले बड़े-बड़ों के होश ठिकाने लगा दिये इसने। बलशालियों को बलहीन बना दिया। छोटे-बड़े सभी देश इसकी चपेट में आ गये। हमारे सामने भी घरों के अंदर सिमटने और अलग-अलग सोने की नौबत खड़ी कर दी।


‘तो क्या तुम उसकी डीलडौल से डर गये?’

‘अरे नहीं। उसकी बातों से। वह मुझे अपना एजेंट बनाना चाहता था। कह रहा था- भैये, मैं तुझे जन्नत का सुख दिला सकता हूँ। बस मेरा एक काम कर दो तो तुम्हें जन्नत में एक एकड़ जमीन दिला दूँगा, जहाँ तुम सुख-चैन की जिंदगी बसर कर सकते हो।’

‘अरे वाह, जन्नत में जमीन? वह भी एक एकड़? हाँ, तो फिर तुमने क्या कहा?’ पत्नी के चहरे पर खुशी की लहर दौड़ रही थी।

मैने कहा- ‘देखो, मुझसे बकवास मत करो। मैं तेरे झाँसो में आने वाला सख्श नही हूँ। दूसरी बात, मेरी चिंता तुझे क्यों होने लगी? क्या लगते हो तुम मेरे?’

इस पर बोला- ‘अच्छा गुस्सा थूक दो और सुनो मेरी बात। चलो कोई बात नहीं। पर तुम मेरा इतना सा काम तो कर ही सकते हो।’

‘चलो बोलो। काम क्या है?’

‘तुम्हें जगह-जगह जाकर मेरे जीवाणुओं को फैलाना होगा। इसके एवज में तुम्हे जन्नत में रहने का सुख मिलेगा।’

‘पर मेरा काम एक एकड़ जमीन से चलने वाला नही है भैये। क्योंकि मेरी दो-दो बीबियाँ और उनसे बच्चे हैं। अलग-अलग घरों में अपने-अपने बच्चों के साथ रहती हैं। मैं अकेले जा नही सकता और उन्हें एक घर में रख नही सकता। वजह तो तुम जान ही सकते हो।’



‘हाँ। तो फिर?’ 

‘इसलिए, मेरे अलावा उन लोगों के लिए भी जमीन का एक-एक टुकड़ा दिला सकते हो तो बोलो। कर सकोगे तीन एकड़ जमीन का इंतजाम?’

‘देखो कोशिश करनी पड़ेगी। ऊपरवाले से एक एकड़ की बात हो रखी है। उनसे राय मशविरा किये बगैर मैं तुम्हारी बातें कुबूल कर नही सकता।’

‘तो चलते बनो।’

‘देखो। मैं इस तरह जाने वाला नही हूँ। अब तुम मेरे हाथ आ गये हो तो आसानी से छोडूँगा नहीं। मान जाओ। नही तो?’

‘नही तो क्या कर लोगे?’ मुझे उसकी बातों पर गुस्सा आ रहा था।

‘देखो क्या करता हूँ।’ कहते हुए उसने अपनी पुरानी सी मैली चादर मेरे ऊपर फैला दी। मेरा दम घुटने लगा। मैं तड़पते हुए कराहने लगा- अरे कोई है, आकर मुझे बचाओ, बचाओ मुझे इस जाहिल से। इस नामाकूल से। यह नामाकूल.......’


मैं चिल्ला रहा था और वह हँसे जा रहा था। इतने में तुमने मुझे झकझोर दिया। अच्छा किया उठा दिया। नहीं तो ब्लडप्रेशर बढ़ने से अस्पताल जाने की नौबत आ जाती। भागवान! अब जरा मुझे ट्वायलेट भी जाने दो। जरा फ्रेश हो लूँ। मेरे दिल की धड़कन भी ठीक हो जाय। और तुम भी जाकर चाय बना डालो। फिर बतियाते रहेंगे। ऑफिस तो जाना है नही। दिन भर समय है बातों के लिये। कोरोना का अध्याय तो अभी समाप्त होना है नही।

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