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जनयुद्ध ने सामंतवाद के खिलाफ जीत स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभाईः प्रचण्ड

person access_timeFeb 13, 2020 chat_bubble_outline0

'जनयुद्ध’ शुरू हुए 25 साल हो चुके हैं। आपके नेतृत्व में शुरू हुए जनयुद्ध को आज कैसे याद करेगें?

 

नेपाली जनता के ऐतिहासिक विद्रोह के रूप मे मुझे जीवनभर जनयुद्ध स्मरण बना रहेगा। जनयुद्ध के दौरान, सभी जातियों, भाषाभाषीयों, क्षेत्र, वर्ग, समुदायों और अधिकांश नेपाली जनता का समर्थन रहा। इस मे हजारों लोगो का बलिदान हुआ। मुझे लगता है, यह उस भागीदारी और बलिदान के कारण ही नेपाल मे संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य आना संभव हुआ।

 

इसलिए, जनयुद्ध नेपाली मिट्टी का एक ऐतिहासिक पहल, युद्ध और विद्रोह था। इसलिए मैं जनयुद्ध के महान शहीदों को श्रद्धांजलि देना चाहता हूं। मैं सभी लापता योद्धाओं के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करना चाहता हूं। मैं सभी योद्धाओं को स्वास्थ्य की शुभकामनाएं देता हूं और उनका सम्मान करना चाहता हूं। विद्रोह के एक प्रमुख नेता के रूप में, मैं शहीदों के परिवारों, गायब हुए और घायल हुए लोगों का सम्मान करता हूं।

 

जनयुद्ध ने कई मुद्दे उठाए थे। वर्तमान स्थिति में उठाए गए मुद्दों के कितने प्रतिशत संबोधित हो सके है ?

 

मैंने इसे प्रतिशत के रूप में नहीं गिना। लेकिन इन सबसे ऊपर, जनयुद्ध ने सामंतवाद के खिलाफ नेपाली लोगों की जीत को स्थापित करने में एक प्रमुख भूमिका निभाई। उस अर्थ में हम कह सकते हैं कि एक तरफ जनयुद्ध ने सामंतवाद के खिलाफ तथा दूसरी ओर विदेशी हस्तक्षेप, साम्राज्यवाद और लोकतंत्र के खिलाफ नेपाल की अस्मिता स्थापित की।  राष्ट्रीय स्वाधीनता के दो मुख्य बिंदु हैं पहला बिंदु सामंतवाद के खिलाफ सफलता हात लगी है और दूसरे बिंदु स्वाधीनता तथा स्वतन्त्रता के लिए हमरा संघर्ष जारी है।

 

संक्षेप में मेरे विचार मे समस्यावों के दो पहाड़ थे: पहला सामंतवाद का पहाड़ और दूसरा साम्राज्यवाद का पहाड़। सामंतवाद के पहले पहाड़ को पार करने मे हम सफल हुए है। राष्ट्रीय स्वाधीनता या साम्राज्यवाद दूसरे पहाड को पार करना बांकी है। हमारी सफलता को 50, 50 कहा जा सकता है।

 

जनयुद्ध का मकसद नेपाल की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अवस्था मे परिवर्तन करना था। आपके विचार मे इसमे कितनी सफलता प्राप्त हुई है?

 

आपने ठीक कहा उस समय, हमने विद्रोह के आयोजन और आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में आमूल परिवर्तन की बात की थी। इसलिए हमने उस समय अपनी विचारधारा को नया जनवाद कहा। नई लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था, नई लोकतांत्रिक राजनीति, नई लोकतांत्रिक सांस्कृतिक नीति का सार यह था कि वह सामंतवाद साम्राज्यवाद-विरोधी नीति थी। वर्तमान का मूल्यांकन करते हुए, हम जहां पहुंचे हैं इसे देखकर कह सकते है, हम राजनीतिक रूप से मौलिक रूप से सफल हुए है और इस प्रक्रिया से गुणात्मक परिवर्तन आया है।

 

आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में भी बदलाव आया हैं, कुछ भी नही हुआ है, यह सच नही है। लेकिन जैसा कि अपेक्षित था, राष्ट्रीय पुंजी का विकास, राष्ट्रीय आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का विकास, जनवादी संस्कृति का विकास के सन्दर्भ मे बहुत कुछ किया जाना अभी भी बांकी है।

 

नेपाल में दस साल जनयुद्ध चला। सायद कम समय मे शांति प्रक्रिया मे जाने के कारण या जनयुद्ध का अन्त सम्झौते मे होने के कारण जनयुद्ध के वास्तविक लक्ष्य और उद्देश्य पूरे ना हो पाए ?  आपको क्या लगता है ?

 

यह एक गंभीर सैद्धांतिक और राजनीतिक सवाल है। कुछ लोगों का सोचना है  कि शांति सम्झौते के माध्यम से जनयुद्ध को जल्दी समाप्त करने का समय नही हुआ था। यदि जनयुद्ध को कुछ ओर लम्बा चलाया गया होता तो क्या सामंतवाद साम्राज्यवाद के विरोध मे निर्णायक जीत मिल गई होती? ऐसे लोग हैं जो ऐसे तर्क देते हैं। यह एक मत है। लेकिन मेरे विचार में यह गलत है।

 

 

हम कम्युनिस्ट या मार्क्सवादी जो भौतिकवाद में विश्वास करते हैं, अंतर्राष्ट्रीय स्थिति और राष्ट्रीय स्थिति, शक्ति के संतुलन इन चीजो को देखकर आगे ओर पीछे ना किया तो बड़ी चीज लेने के बजाय सब कुछ खो देने का खतरा भी तो हो सकता था। जैसा कि लेनिन ने कहा था अगर हम नहीं जानते कि परिस्थितियों का ठोस विश्लेषण कर कब या कैसे आगे बढ़ना है क्योंकि कभी-कभी इसके दुस्परिणाम समकालीन दुनिया में देखे जा सकते हैं। हमारे देखते देखते पेरू की क्रांति क्षतविक्षत हो गयी।

 

सम्पूर्ण जीत की आशा मे कुछ भी हात नही लगा। साइनिङपाथ का नाम अब कोई भी नही लेता। गोंजालो जेल मे ही समाप्त होने की स्थिति मे है ? श्रीलंका मे तमिल विद्रोह क्या था क्या हो गया ? भारत मे ही देखिए वहा क्या हो रहा है ? फिलिपिन्स और टर्की मे कम्युनिष्ट आन्दोलन कहाँ तक पहुँचा था पर परिणाम क्या हुआ ? अन्य देशोंमे भी माओवादी आन्दोलन उपलब्धी विहीन होकर किस तरीके से क्षतविक्षत हो गए? शान्ति सम्झौते के बात करते समय इन घटनाओं का भी विश्लेषण होना चाहिए।

 

क्रान्ति और अन्तर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन अन्तर्राष्ट्रीय परिघटनाएं है। एक ही देश मे आसनी से संभव नही होगीं, क्योंकि इसमे अन्तर्राष्ट्रीय प्रभाव भी काम करता है।

 

जनयुद्ध के दौरान अन्तर्राष्ट्रीय प्रभाव की भूमिका कैसी रही ?

 

मुझे लगता है, मैने देश और अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थिति को सटीक तरीके से मूल्यंकन करके सही समय मे सही निर्णय लिया था। जिसकी बदौलत नेपाल को गणतंत्र के युग मे ले आना संभव हो सका। यदि मैने वह सब न किया होता और एक दो वर्ष और लडने का निर्णय लिया होता तो हमारे लिए भी स्थिति भयानक हो सकती थी। नेपाल राष्ट्र और नेपाली जनता को अकल्पनीय क्षति का  समना करता पड सकता था।

 

क्योंकि कुछ परिस्थितियां ऐसी निर्माण होने लगी थी कि अन्तर्राष्ट्रीय शक्तियां नेपाल के जनयुद्ध को असफल बनाने के लिए  नेपाल मे आकर माओवादीयों से लडने की तयारिंयों मे लग चुकी थी। इस की जानकारी मुझे हुई और मुझे यह भी पता चला  कि नेपाल मे उनके हतियार आचुके है। इजरायल से कितना हतियार आया ? बेल्जीयम से कितना हतियार आया ? अमेरिका की सेना कैसे रेंजर बटालियन बना रही थी ? यह सब बातें मुझे क्लियर हो चुकी थी। अन्तर्राष्ट्रीय शक्तियां नेपाल मे आकर नेपाल को असफल राष्ट्र घोषणा करने की ओर अग्रसर हो रही थी। नेपाली जनता के उपर विदेशी शासन होने का खतरा बन चुका था। हम सभी ने अफगानिस्तान को देखा हैं, इराक को भी देखा हैं, सिरीया भी देखा हैं। पहले विश्वयुद्ध की बातें तो रहने ही दीजिए।

 

मेरा विवेक कहता है कि मैने देश के अन्दर के अन्तर विरोध को सही तरीके से विश्लेषण किया।  मैने और मेरे नेतृत्व वाली पार्टी ने अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों को ज्यादा प्रोभोक करना उचित नही समझा।

 

जनयुद्ध को अल्प समय मे शान्ति प्रक्रिया और राजनीतिक परिवर्तन मे रूपान्तरित किया गया, जिससे कई लोग असन्तुष्ट भी है। क्या यह असन्तुष्टि बडी होने का खतरा नही है ?

 

इस बारे मे मैने वृहत चिन्तन किया है। मै विश्वस्त हूं कि छोटीमोटी असन्तुष्टियां आगे नही बढेंगी। सामान्य स्तर मे होने वाला विद्रोह जनयुद्ध का रूप नही ले सकता। लोग कुछ ना कुछ बातें तो करते ही रहते है। लेकिन वह राजनीतिक आन्दोलन के रूप मे और उसके बाद जनयुद्ध के रूप मे एवं राजनीतिक विद्रोह के रूप मे लाखो करोडों जनता की सहभागिता अब नेपाल मे संभव नही है।  

 

आप के साथ जनयुद्ध मे सहभागी विप्लव ने विद्रोह के लिए हतियार उठा लिया है। उस समूह का तर्क है कि पिछली क्रान्ति अधुरी रह गई। आप ही की पार्टी की सरकार उनके प्रति आतंकवादी जैसा व्यवहार कर रही है। अभी दिख रही  यह छोटी चिंगारी बाद मे बडी नही हो सकती क्या ?

 

नही, इस के बढने का कोई चान्स नही। इस चिंगारी को बुझना ही होगा। मै तो विद्रोह मे उतरे सभी साथीयों से अनुरोध करता हूं कि आप लोग भी हमारे साथ आइए। देश मे अभी वामपन्थीओं का वर्चस्व है। अभी भी पार्टी और सरकार मे विद्रोह मे उतरे लोगों के प्रति प्रेम रखने वाले लोग है, विद्रोहीयों के लिए अभी भी उपयुक्त समय है।

 

विद्रोह वा क्रान्ति जो भी कहिए, उसका नेतृत्व आपने किया। लेकिन अब कुछ नेता भिन्न समूह मे हैं। इस बदली परिस्थिति मे क्या आपको नही लगता, कि आपके नेतृत्व मे कुछ कमजोरीयां थी ?

 

मै इस बात से सहमत नही हूं। आप ही कहिए इसका प्रमाण तो तब होता दुसरों ने कोही अच्छा काम किया होता। ऐसा होता तो मेरी कमजोरी साबित होती। परिस्थिति तो यह है कि दूसरा पक्ष एक के बाद एक गलती किये जा रहा है। भिन्न समूह बनाकर राजनीति मे बने रहने की चेष्टा करना उन लोगों का ही दोष है।

 

बाबुराम भट्टराई जी अब मेरे साथ नही है। बाबुरामजी कहाँ है ? नेपाली राजनीति मे उनकी भूमिका कितनी रह गई है। यह सम्पूर्ण नेपाली और दुनियां देख रही है, समझ रही है। मै चाहता हूं कि बाबुरामजी को फिर से अपनी विद्वता और क्षमता इसी आन्दोलन मे खर्च करनी चाहिए, यह उनके लिए मेरा सुझाव है। उन्होंने जो गलती की है उसका दोषारोपण मुझपर क्यों किया जाता है ?

 

देश के लिए उन्होंने अच्छा और बडा काम किया होता तो मै उसको स्वीकार करता।

 

मोहन वैद्यजी से मै अभी भी प्रेम करता हूं। उन के लिए अभी भी मेरे हृदय मे बहुत सम्मान है। बाबुरामजी से भी मेरा प्रेम यथावत है। हम सब बडे लम्बे समय तक एक साथ रहे, एक साथ युद्ध लडा, सुख दुख साथ साथ झेला।

 

आपने कई बार कहा है कि विप्लव ने दूसरा प्रचण्ड बनने की महत्वकांक्षा रखी है !

 

आन्दोलन से प्रचण्ड पैदा होतें है, न कि प्रचण्ड से आन्दोलन हुआ करते है। लम्बे जनयुद्ध ने मुझे प्रचण्ड बनाया है। इस बात का हम सब को गर्व करना चाहिए, विप्लवजी को भी गर्व करना चाहिए। बाबुरामजी और किरणजी को भी गर्व करना चाहिए। और इसको और भी मजबूत करने के लिए हम सबको एक स्थान मे रहना चाहिए। विद्रोह की बातें करने से पहले देश की अंदरुनी परिस्थितियों को भी देखना चाहिए।

 

आर्थिक और सांस्कृतिक रूपान्तरण का सवाल पूरा क्यों नही हो सका ?

जनयुद्ध और क्रान्ति पूर्ण सफल नही हुयी। हम लोगों ने सम्झौता किया है। बुर्जुवा के साथ सम्झौता करके देश को गणतन्त्र तक लाने के लिए हम लोगो ने अनेकों संघर्ष ही नही बरन त्याग का योगदान भी दिया है। यदि हम लोग विजयी होकर आए होते तो अपनी मान्यता अनुसार आर्थिक और सांस्कृतिक रूपान्तरण करते। सम्झौते के माध्यम मूलधार की राजनीति मे आने के कारण आर्थिक और सांस्कृतिक रूपान्तरण हमारी सोंच के मुताबिक नही हो सका।

 

जनयुद्ध के घायल ओर लापता लोगों के परिवार का अभी तक व्यवस्थापन नही हो सका है, इसमे देरी क्यों हो रही है ?

 

यह सारी बातें विस्तृत शान्ति सम्झौता अन्तर्गत सत्य निरूपण तथा मेलमिलाप आयोग और लापता छानबीन आयोग से सम्बन्धित है। शान्ति सम्झौते मे यह सब बातें तुरन्त करने का प्रावधान रखा गया था। लेकिन यह नही हो सका। यदि यह होता तो अभी तक किसी न किसी रूप मे समाधान हो जाता। इस विषय मे हमारे प्रयास अभी भी जारी है।

 

जनयुद्ध हो या नेकपा एमाले के साथ की एकता ? ऐसे असंभव विषय को आपने संभव कर दिखाया, इसका राज क्या है ?

 

मै हमेशा कहता हूं कि ‘निरन्तरता का क्रम भंग’ प्रकृति, समाज और मानव चिन्तन के विकास का स्वभाविक नियम है। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद भी यही कहता है। 'विकास सिर्फ मात्रात्मक नही होता है वरन कभी कभी छलांग भी लगानी पडती है' मै अक्सर ऐसा कहता रहता हूं। समाज को अग्रगति देने के लिए कभी कभी जोरका झटका भी लगाना पडता है। आपका प्रश्न मेरी इन्ही धारणाओं से सम्बन्धित है।

 

रातोपाटी नेपाली संस्करण मे प्रकाशित सत्ताधारी नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (नेकपा) के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड (नेपाल मे हुए 10 वर्ष लम्बे माओवादी जनयुद्ध के सुप्रीम लीडर थे) के अन्तरवार्ता का संक्षिप्त हिन्दी रूपान्तरण

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