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जनयुद्ध की २५ वीं वर्षगांठ : राजतन्त्र से गणतन्त्र तक का सफर

person access_timeFeb 13, 2020 chat_bubble_outline0

 आज १३ फरवरी २०२० । जनयुद्ध की पच्चीसवीं वर्षगांठ । आज से २५ वर्ष पहले अर्थात् १३ फरवरी १९९६ को लगभग पौने चार बजे शाम के समय में कुछ युवक और युवतियों का एक समूह गोरखा जिले के च्याङ्ली में कृषि विकास बैंक की शाखा में पहुंचा । समूह के एक युवक ने वहां आने के उद्देश्य के बारे में संक्षेप में अपनी बात रखी । समूह के दूसरे सदस्यों ने बैंक की शाखा में जमा किसानों के ऋण से सम्बन्धित सारे दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिये । इस बीच बाजार में खरीददारी के लिए आये लोग भी वहां पर जमा होने लगे थे  ।

उन लोगों को बैंक के ऊपर की कार्यवाही के कारण के बारे में बताया गया और यह भी बताया गया कि किस तरह कृषि विकास बैंक किसानों को मंहगे ब्याज दर पर कर्जा देकर उन्हें लूट रहा है । भाषण देने वाले व्यक्ति ने बताया कि क्यों किसानों को लूटने वाली शासन प्रणाली को खत्म करने की जरुरत है । बैंक में जमा किसानों के जमीनों के पट्टे तो छापामारों ने  सुरक्षित अपने पास रखा जिसे सम्बन्धित जमीन के मालिक किसान को बाद में लौटा दिया जायेगा लेकिन  किसानों के जो  लोन पेपर थे उन्हें वहां पर जमा हुए लोगों के  सामने जला दिया गया । ये सारी कार्यवाही आधे घन्टे से भी कम समय में खत्म हुई । बैंक से आधे किलोमीटर की दूरी पर स्थित पुलिस चौकी को इस घटना की भनक तक नहीं लगी । 
   

  उसी दिन अर्थात् १३ फरवरी की रात को करीब ८ बजे से ११ बजे के बीच पश्चिम नेपाल के दो जिले रुकुम, रोल्पा और पूर्वी नेपाल का एक जिला  सिन्धुली के दूरदराज की तीन अलग–अलग पुलिस चौकियों पर माओवादी छापामारों ने हमले कर दिए । इन हमलों में छापामारों ने किसी भी पुलिसकर्मी की जान नहीं ली क्योंकि ऐसा करना पार्टी नीति के खिलाफ होता । पर उन्होने तीनों पुलिस चौकियों पर पहले अपना नियन्त्रण कायम किया । उसके बाद वहां से कुछ राइफलें, विस्फोटक सामग्री और अन्य उपयोगी सामानों को अपने कब्जे में लेने में सफल हो गए । उन छापामारों ने न केवल पुलिसवालों की जान नहीं ली बल्कि नियन्त्रण में लिए गए पुलिसे जवानों कोे रस्सियों में बाधकर उन्हें ओढने के लिए रजाई दे दी ताकि उन्हें ठण्ड न लगे । उन्होंने कार्यवाही को अन्जाम देने के बाद जनवादी क्रान्ति के उद्देश्यों के बारे में संक्षेप में पुलिस टीम के सामने अपनी बात भी रखी । उसके बाद ये छापामार माक्र्सवाद, लेनिनवाद और माओवाद जिन्दावाद π जनयुद्ध की दिशा में आगे बढें π आदि नारे लगाकर  घटनास्थल से तितरबितर हो गए । १३ फरवरी को ही काठमाडौं की कोकाकोला बोटलिंग प्लान्ट में माओवादी छापामारों ने आक्रमण किया । उसी दिन काभ्रे में एक सूदखोर सामन्त के घर में जाकर माओवादी छापामारों ने १३ लाख रुपये अपने कब्जे में लिया ।  उससे बडी संख्या में किसानों को दिए गए कर्ज के कागजाज बरामद किए गए जिन्हें छापामारों ने जलाकर नष्ट कर दिया । छापामारों ने सूदखोर को कोई भी शारीरिक चोट नहीं पहुंचायी । चेतावनी देकर उसे छोड दिया गया ।

 १४ फरवरी को रेडियो नेपाल ने अपने समाचार बुलेटिन मे मात्र यह समाचार दिया कि रोल्पा जिले में कुछ उपद्रवियों ने पुलिस चौकी पर हमला किया जिसे पुलिस ने विफल कर दिया । 
      आज से ठीक २५ वर्ष पहले नेपाल के उक्त ६ जिलों के दुरदराज के गांवों में घटी ये घटनाएं बाहर से देखने में बहुत ही मामूली घटनाएं लगती हैं । क्योंकि जिस दौर में हम जी रहे हैं उस में लडाई का मतलब है शहर दर शहर में एक बडे हिस्से की तबाही, हवाई जहाजों से मिसाइल और बमों की बारिश, खूनखराबा व आम नागरिकों और बूढे और बच्चों की बडी संख्या में होने वाली मौतें । अफगानिस्तान, इराक और  सिरिया आदि देशों में जारी युद्ध में यही नजारा दिखायी देता है । पर नेपाल में नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी  (माओवादी)  ने जिस लडाई को २५ वर्ष पहले आज के ही दिन छेडा था वह बिल्कुल ही अलग तरह की लडाई थी । उसे माओवादियों ने जनयुद्ध का नाम दिया था । पार्टी का जनयुद्ध शुरु करने के लिए नारा था : महान जनयुद्ध की दिशा में आगे बढें । ऊपर बताये गए ६ जिलों में छापामार कार्वाही को अन्जाम देने के लिए ऐसे लोग आगे आये थे जो गांव देहात के वाशिन्दे थे ं जिनमें से ज्यादातर नौजवानों की उम्र लगभग २० और २५ वर्ष के बीच में थी । ये सभी गांव के गरीब किसानों के बेटे और बेटियां थी । उनका पहनावा फौजी नहीं था बल्कि गांव के किसान अपना शरीर ढकने में जिन कपडों का उपयोग करते हैं वैसे  ही कपडे पहनकर वे चौकी कब्जा करने निकल पडे थे । उनके पास हथियार के नाम पर किसानों द्वारा प्रयोग में लायी जानेवाली चीजें थीं जैसे कुल्हाडी, खुखरी, लोहे की राड आदि ।

हां,  गांव देहात में ही उन्होने कुछ बिल्कुल ही सामान्य प्रकार के बमगोले आदि भी तैयार किए थे जिसका उन्होने इस आक्रमण में प्रयोग किया था । कुछ भरमार बन्दूकें भी उनके पास थीं । उन लडाकों का हुलिया, पहनावा और उनके द्वारा छापामार आक्रमण में प्रयोग में लाये गये साधनों को देखकर यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि वे कुछेक दर्जन छापामार आगे चलकर कुछ ही सालों में  एके ४७ और एम १६ जैसे हतियारों से लैस हो जायेंगे  और सैन्य पोशाकों में सजी हुई एक शक्तिशाली  फौज की शक्ल में बदल जायेंगे । किसी ने सपने में भी नही सोचा था कि ये बेहद सीदे सादे दिखने वाले ग्रामीण छापामार दस्ते आगे चलकर  २५० साल पुरानी राजशाही का खात्मा कर देंगे । ऐसी राजशाही जिसे अमेरिका, भारत और चीन जैसे दुनिया के शक्तिशाली मुल्कों का भरपूर समर्थन था । १३ फरवरी की रात को नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (माओवादी) ने न केवल फौजी छापामार कार्वाही को अन्जाम दिया बल्कि राजनैतिक कार्वाही के तौर पर  नेपाल के ७५ जिलों में से ६० जिलों के मुख्यालयों मे माओवादी पार्टी क ी ओर से  हजारों  की संख्या में परचे बांटे गए । इन पर्चों में बताया गया था कि नेपाल की सत्ता कि हद तक प्रतिक्रियावादी है और यह भी बताया गया था कि उसे जड से खत्म किया जाना क्यों जरुरी है । पर्चों में जनयुद्ध के रास्ते पर आगे बढने के लिए जनता से अपील की गई थी । साथ ही जनवादी क्रान्ति के जरिये प्रतिक्रियावादी सत्ताको खत्म कर नयी जनवादी सत्ता खडी करने की जोरदार अपील भी की गई थी ।

चिनी कम्युनिष्ट पार्टी के चेयरमैन माओ ने सन् १९३० में लिखा था कि एक चिंगारी सारे जंगल को राख कर सकती है । आज से २५ वर्ष पहले रोल्पा, रुकुम गोरखा और सिन्धुली जिले के सामान्य से दिखने वाले क्रान्ति की विचारधारा से लैस गांव के नौजवान रात के अन्धेरे में जब छापामार कार्वाही के लिए निकले थे तो उन्होने एक सपना देखा था कि वे नेपाल में राजशाही का खात्मा करेंगे । उनका निश्चय था कि वे नेपाल की प्रतिक्रियावादी सत्ताको खत्म करते हुए  जनवादी गणतन्त्र नेपाल का निर्माण करके ही दम लेंगे चाहे कितनी भी बडी कुर्बानी क्यों न करनी पडे । वे नौजवान छापामार एक चिंगारी की तरह ही थे जो आगे चलकर एक अग्निज्वाला में बदल गए और उस अग्निज्वाला ने राजतन्त्र के जंगल को पूरी तरह जलाकर खाक कर दिया । यह बात अलग है कि अभी जनवादी क्रान्ति की पूर्णता पाने में  और समाजवाद को हासिल करने में लम्बा सफर तय करना है लेकिन यह निश्चित है कि जनयुद्ध के जरिये नेपाल में २४० वर्ष पुरानी राजशाही ताश के महल की तरह ढह गयी और गणतन्त्र की स्थापना हुई इसके  पिछे जनयुद्ध की अहम भूमिका है । जनयुद्ध की २५ वीं वर्षगांठ के मौके पर हम जनयुद्ध के तमाम शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं ।

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