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आगमन नव वर्ष 2077 का

person access_timeApr 13, 2020 chat_bubble_outline0

आज विक्रम संवत 2077 का पहला दिन है। इस प्रकार विक्रम संवत को मानने वाले देश और लोगों के लिए यह नए वर्ष के शुभारंभ होने का पहला पावन दिन है।
पर देश में नये वर्ष के आगमन के अवसर पर दिखनेवाला वह जोश, उल्लास और हर्ष का हर ओर अभाव महसूस हो रहा है, जो नये वर्ष के आगमन के अवसर पर हमेशा दिखता था, अनुभव किया जाता था। इसका कारण है कोरोना नामक प्राणघातक वायरस से देश में उत्पन्न डर, त्रास और दहशत का माहौल और इस वायरस के संक्रमण से विश्व भर में उत्पन्न त्रासदी और मातम का वातावरण। फलतः इस नये वर्ष का उस उत्साह के साथ स्वागत या अभिवादन न किया जा सका जिस उत्साह के साथ इसका अभिवादन किया जाना चाहिये था या विगत वर्षों में होता आया है।


फिर भी वर्ष में एक बार आनेवाले इस उत्सव, जो देश और मनुष्य के जीवन में प्रगति और उपलब्धी के कई्र अवसर उपलब्ध कराता है और ऋतुचक्र का मार्ग प्रशस्त करता है, के आगमन पर कई देशवासी फेसबुक, ह्वट्स एप्प, और ट्विटर जैसे सामाजिक संजाल के माध्यम से अपने बन्धु-बान्धवों और मित्रों को शुभकामनाएँ भेजने की औपचरिकतायें पूरी करते हुए यह बताने में लगे हैं कि यह नयाँ वर्ष समस्त लोगों के जीवन को यथाशीघ्र इस वायरस के खतरे और भय से मुक्त करे और जीवन में खुशहाली लाए। मैने भी उठते ही पत्नी को ‘नव वर्ष मंगलमय हो बेगम’ कहते हुए शुभकामना तो दी। पर इस डर से गले लगकर आत्मीयता प्रदर्शन करने की हिम्मत न जुटा सका कि सोशलडिस्टेंसिंग के इस माहौल में जब बिस्तर भी अलग लगाने की नौबत आई हुई हो, गले लगना कही आ बैल (कोविड- 19 नामक जीवाणु) मुझे मार’ न साबित हो? भय का यह माहौल पता नही कब तक चलेगा? पति-पत्नी के बेड कब तक अलग-थलग होंगे?

अवसर नये वर्ष का है। अतः इसकी भी बात हो जाय। हमारे देश का पंचांग विक्रम संवत पर आधारित है, जो 13 अप्रैल से शुरु होता है। अर्थात विक्रम संवत का प्रारंभ 13 अप्रैल से होता है। और गतिमान् समयचक्र के हिसाब से यह शुरु भी हो चुका है।


नेपाल में विभिन्न धर्म, जाति और सम्प्रदाय के लोग रहते हैं। सभी के अपने-अपने धर्म हैं। उनकी अपनी-अपनी परम्पराएँ है। रहन-सहन, खानपान और वेशभूषा में पृथकता है। अतः यहाँ के तीज-त्योहार और पर्वों में भी पृथकता पायी जाती है। पर मनाने का लक्ष्य एक ही रहता है। जीवन को रसमय बनाने का, खुशियों से भरने का और सामाजिक सद्भाव, साम्प्रदायिक एकता, आपसी मेल और पारस्परिक प्रेम को अभिव्यक्त करने का। तीज-त्योहार और पर्व ऐसे ही अवसर होते हैं जिसमें समाज के सभी वर्गों की सहभागिता होती है और वे समान भाव से सम्मिलित होकर खुशियाँ मनाते हैं। नाचते-गाते और मिलजुल कर खाते-पीते हुए उल्लासित होते हैं।


नया वर्ष का उत्सव भी एक ऐसा ही अवसर उपलब्ध कराता है। अतः विभिन्न धर्मों को मानने वाली नेपाली जनता विभिन्न अवसरों पर नया वर्ष मनाती है। ये हैं- गुरुंग समुदाय के लोगों के द्वारा मनाया जाने वाला तमु ल्होसार, जो पञ्चांग के अनुसार इस बार दिसम्बर महीने की अंतिम तारीख को मनाया गया। दूसरा है- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाने वाला सन् ईस्वी का नव वर्ष, जो जनवरी के 1 तारीख के दिन मनाया जाता है। तीसरा नव वर्ष फरबरी के महीने में शेर्पा जाति के लोगों के द्वारा मनाया जाता है। यह नव वर्ष नेपाल के अलावा तिब्बत, चीन, जापान, कोरिया आदि देशों में भी मनाया जाता है। और चौथा है नेवार जाति के द्वारा मनाया जाने वाला नेवाः संवत का नया वर्ष। इसके अतिरिक्त शक संवत मनाने की भी प्रथा है, जिसका प्रचलन सीमित रूप में ही होता है। अभी हमारे सामने विक्रम संवत का 2077 वाँ साल नये वर्ष के रूप में विद्यमान है और जिसे राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली हुई है। पर विसं के इस 2077 वें वर्ष के ऊपर कोरोना का जो ग्रहण लगा है उसके कारण हर ओर सूनापन है। दुकानें अधखुली हैं। होटल और रेस्टूरा बंद हैं। होटलों में थिरकने वाले पैर घरों में सिमटकर रहने को विवश हैं। वायरस के संक्रमण के भय से मठ और मंदिर के कपाट भी बंद हैं। स्तूपों के शिखरों पर अंकित और श्रद्धा और भक्ति के भाव उत्पन्न कराने वाले भगवान् बुद्ध के अर्धोन्मीलित नेत्र भी अब मानों कह रहे हों- ‘वत्स ! घरों के अंदर ही रहो, तुम्हें वहीं सुरक्षा मिलेगी। बाहर निकलोगे तो सबसे पहले सड़क पर धुप सकते मुर्गे बनाना पड़ेगा। और घर लौटने पर बाल-बच्चे, पत्नी, बृद्ध-माता-पिता तुम्हारी हरकत के शिकार बन सकते हैं। अतः खुद की सोचो। इन सबों की भलाई सोचो। एहतियात बरतो। हालात के नाजुक दौर को समझो। समय ठीक नही है। सुरक्षित रहोगे तो 2078 मना लेना। खूब नाचना, गाना। अभी तो इतना हीं कहूँगा- ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माँ कश्चिद् दुःख भाग्भवेत।
अस्तु

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